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करकोक में इराक़ी तेल का 40 प्रतिशत से अधिक भंडार है और कुर्दिस्तान सरकार अपनी सीमित अर्थ व्यवस्था के कारण इस क्षेत्र को अपने में शामिल करना चाहती है अगरचे दस लाख की आबादी वाले इस एतिहासिक शहर में कुर्दों की संख्या केवल 35 प्रतिशत है।

कुर्दिस्तान रियासत में जनमत संग्रह के बाद से ही इराक़ की केन्द्रीय सरकार और कुर्दिस्तान सरकार के बीच तनाव बना हुआ है और इस बीच मतभेदों वाले कुछ स्थानों पर छुटपुट झड़पों की घटनाएं भी हुई हैं, इराक़ की केन्द्रीय सरकार और कुर्दिस्तान रियासत के बीच सबसे अधिक मतभेद और तनाव जिस क्षेत्र के लिए पाया जाता है वह करकोक है, करकोक इराक़ का वह शहर है जिसमें अल्पसंख्य, कुर्द, अरब और तुर्कमन रहते हैं, और बसरा के बाद इराक़ का दूसरा सबसे अधिक तेल वाला क्षेत्र है, और इराक़ी कुर्दिस्तान की आमदनी का एकलौता स्रोत करके के तेल से होने वाली आमदनी है। हम अपने इस विश्लेषण में यह बताने की कोशिश करेंगे कि किन तर्कों के आधार पर कुर्दिस्तान रियासत करकोक को लेकर इनती संवेदनशील है? या फिर करकोक के संकट और केन्द्र सरकार के साथ मतभेद कुर्दिस्तान की किस मांग के कारण पैदा हुआ है?

मतभेद वाले क्षेत्र

इराक़ी संविधान में “मतभेद वाले क्षेत्र” उन क्षेत्रों को कहा जाता है जो अपनी विभागीय सीमाओं में इराक़ी सरकार की सियासत के कारण 1968 से 2003 तक जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुआ है और इस समय भी केंन्द्र सरकरा, कुर्दों और दूसरी कौमों और समुदायों के बीच विवाद का मुद्दा बना हुआ है। कुर्दिस्तान रियासत इराक़ से अलग होने के लिए जो महत्वपूर्ण तर्क दे रही है उनमें से एक इराक़ी संविधान की धारा 140 का अपनी समय सीमा यानी 2007 के अंत तक लागू न किया जाना है, इस बहाने से वह इराक़ी सरकार पर बात से फिरने का आरोप लागकर आज़ादी के लिए किए गए जनमत संग्रह का औचित्य दर्शा रहे हैं।

दोनों पक्षों के लिए करकोक का महत्व

अब यहां पर यह प्रश्न उठता है कि आखिर क्या कारण हैं कि इराक़ की केंन्द्र सरकार और कुर्दिस्तान रियासत के बीच सैन्य झड़प शुरू होने का स्थान करकोक बना है?

इस सवाल का उत्तर आर्थिक मामलो में छिपा हुआ है, क्योंकि करकोक में इराक़ी तेल का 40 प्रतिशत से अधिक भंडार है और कुर्दिस्तान सरकार अपनी सीमित अर्थ व्यवस्था के कारण इस क्षेत्र को अपने में शामिल करना चाहती है अगरचे दस लाख की आबादी वाले इस एतिहासिक शहर में कुर्दों की संख्या केवल 35 प्रतिशत है।

कुर्दिस्तान की अर्थ व्यवस्था के लिए करकोक के महत्व को समझने के लिए हमे इस बिंदु पर विशेष ध्यान देना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार कुर्दिस्तान रियासत का प्रतिदिन का तेल निर्यात पाँच लाख पैंसठ हज़ार बैलर है जिसे वह पाइप लाइन के माध्यम से निर्यात करता है, तेल का यह बड़ा निर्यात ओपेक के एक महत्वपूर्ण सदस्य कतर के तेल निर्यात के बराबर है।

केंन्द्र सरकार भी इस बात को जानती है और इसीलिए उसने कुर्दों के हाथ में तेल के इस बड़े भंडार के लगने जिसके बाद वह इराक़ से अलग होने की और अधिक हुंकार भरेंगे से बचने के लिए अल्टीमेटम जारी किया है पेशमर्गा बल करकोक को छोड़कर पीछे हट जाए और इस शहर का प्रबंधन इराक़ी बलों के हवाले किया जाए, जिसका कुर्दिस्तान सरकार ने विरोध किया है, अगरचे इस सप्ताह के आरम्भ में दक्षिणी और पश्चिमी करकोक के दो भाग बशीर और ताज़ा कुर्दों के पेशमर्गा बलों के पीछ हटने के बाद इराक़ी बलों के हाथ में आ गए हैं।

इन दिनों इराक़ी बल करकोक की तरफ़ बढ़कर और उसके आसपास के क्षेत्रों में कैंप लगाकर करकोक को पेशमर्गा बलों के हाथों से निकालने के लिए तैयार कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ़ मसऊद बारज़ानी ने भी इजरायल द्वारा प्रशिक्षित 10000 से अधिक पेशमर्गा बलों को केन्द्र सरकार के किसी भी सैन्य हस्तक्षेप से मुकाबला करने के लिए करकोक में लगा दिया है।

इस संकट के बाद कुर्दों की मांगे

ऐसा लगात है कि कुर्द आंदोलन चाहे अनचाहे दो रणनीति को एक दूसरे के मुकाबले में लेकर चल रहे हैं, एक तरफ़ तो वह यह चाहते हैं कि ऐसी स्थिति में पहुँच जाएं कि अगर आवश्यक हो तो कम से कम खर्च और समय में अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय वैधता के साथ कुर्दिस्तान की आज़ादी का एलान कर सकें। और दूसरी तरफ़ अपनी मांगो को भी रख रहे हैं।

उनकी मांगे इन तीन मांगों का समावेश हो सकती है

कानूनी प्रक्रिया के साथ करकोक, खानेकैन और कुर्दिस्तान रियासत से अलग थलग हिस्से (जिनके बारे में कुर्दों का दावा है कि वहां कुर्द बहुसंख्यक है) को आधिकारिक रूप से कुर्दिस्तान में शामिल किया जाए।
कुर्द बिना किसी रोक टोक के अपने तेल के खनन और बिक्री को जारी रख सकें।
बगदाद की पैठ इतनी अधिक न हो कि वह कुर्दिस्तान में किसी एक पार्टी के सत्ता में आने में हस्तक्षेप कर सके।
लेकिन जो चीज़ इसको और अधिक पेचीदा बना रही है उसका त्रिकोणीय होना है, यानी अगर कुर्दों की इस मांग को पूरा करने की योग्यता रखता भी हो तब भी एक तरफ़ अशांति का पैदा होना और दूसरी तरफ़ कुछ खास पार्टियों की नाराज़गी इस परिद्रशन्य को और अधिक अंधकारमयी बनाती है, और शायद यही कारण है कि कुर्दिस्तान रियासत के प्रधानमंत्री नचीरवान बारज़ानी ने इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए सुझाव दिया है कि इराक़ के सुन्नियों की भी कुर्दों की भाति अलग सरकार हो। ऐसा लगता है कि इस स्थिति में इराक़ एक दोराहे की तरफ़ जा रहा हैः अपनी अधिकतम की मांग में कमी लाना, या फिर टुकड़ होना जैसा कि अमरीका और इजरायल यही चाहते हैं।

संक्षेप में अगर कहा जाए तो ऐसा लगता है कि दाइश के बाद इराक़ एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। भविष्य में होने वाली जंग दाइश के विरुद्ध जंग में भिन्न इस मामले में है कि यह जंग आंतरिक होगी। इराक़ में कुर्दों ने ज़ायोनी शासत के भड़कावे में आकर तनावपूर्ण हरकते की हैं जिससे दोनों पक्षों में तनाव पैदा हो गया है और भविष्य में टरकाव हो सकता है।

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