SHARE



यूरोपीय संघ ने शनिवार के दिन एक घोषमा पत्र जारी करके म्यांमार सरकार को आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी दी है।

इस घोषणा पत्र में म्यांमार सरकार से मांग की गई है कि वह राख़ीन प्रांत में संघर्ष को समाप्त करने के लिए प्रभावी कदम उठाए। राख़ीन में दस लाख से अधिक मुसलमान रहते हैं जिनमें से अधिकतर रोहिग्याई है। म्यांमार सरकार रोहिग्याई मुसलमानों को इस देश का नागरिक नहीं मानती है, और इस समय म्यांमार की सेना और कट्टरपंथी गुटों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों पर जारी अत्याचार और जनसंहार के कारण म्यांमार पर अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों और मानवाधिकार संगठनों की तरफ़ से दबाव पड़ रहा है।

म्यांमार में 25 अगस्त से शुए हुए मुसलमानों के जनसंहार के नए दौर के बाद से अब तक लगभग पाँच लाघ मुसलमान बांग्लादेश भागने पर मजबूर हुए हैं। अब तक बंग्लादेश और म्यांमार की सीमा पर 7 साल शे अधिक रोहिंग्याई ठहरे हुए हैं जिससे क्षेत्र में मावनीय संकट पैदा हो गया है।

यूरोपीय संघ के सदस्यों ने चेतावनी दी है कि अगर म्यांमार सरकार देश की स्थिति को सुधारने के लिए कार्य नहीं करेगी तो यह संघ इस देश के सबक सिखाने के लिए कड़े कदम उठाएगा।

राख़ीन का संकट उस समय शुरू हुआ कि जब रोहिंग्याई सेना के कुछ लोगों ने म्यांमार में सीमावर्तीय पुसिल स्टेशनों पर हमला किया और उसमें 12 पुलिस वाले मारे गए, जिसके बाद म्यांमार सेना ने बौद्ध कट्टरपंधियों के सहायता से रोहिग्याईयों का जनसंहार, बलात्कार और दमन शुरू कर दिया जिसमें लगभग 1000 रोहिंग्याई मारे गए और लाखों की संख्या में विस्थापित हुए हैं।

2012 से अब तक राख़ीन में रोहिग्याईयों के गावों पर कई बार सेना ने बर्बर हमला किया है। यूरोपीय संघ ने यह घोषणा पत्र म्यांमार की राष्ट्रपति आंग सान सूची द्वारा राख़ीन में उठाए गए अंतिम कदमों के बाद जारी किया है। सूची ने 12 अक्टूबर को राख़ीन संकट समाप्त करने के लिए तीन प्राथमिक्ताओं वाला एक प्लान जारी किया था जिसमें बंग्लादेश विस्थापित हो चुकी रोहिंग्याईयों की म्यांमार वापसी, उनको तुरंत सहायता प्रदान करना, आवास का प्रबंध और क्षेत्र में शांति के लिए रास्तों को तलाश करना था।

यूरोपीय संघ ने इससे पहले से सेना के कमांडरों और म्यांमार को हथियार भेजे जाने पर प्रतिबंध लगा रखा है। यूरोपीय संघ के देशों ने अपने घोषमा पत्र में कहा है कि म्यांमार सेना के कुछ कमांडरों और सेना को हथियार देने पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया है और इसका कारण यह है कि वह इन चीज़ों का प्रयोग आंतरिक दमन के लिए न कर सकें।

इस संघ ने इसी प्रकार एलान किया है कि रोहिग्याईयों पर मानवता के विरुद्ध और तमाम दमन कारी कुकर्मों जैसे बच्चों और औरतों पर हमले की अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा जांच की जानी चाहिए और म्यांमार सरकार को इस मामले में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के साथ सहयोग करना चाहिए।

इसी प्रकार इस घोषणा पत्र में म्यांमार सरकार से कहा गया है कि इस मानवीय त्रासदी को कम करने के लिए पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश के साथ बातचीत करे।

इससे पहले भी कई देशों के मानवाधिकार संगठनों ने म्यांमार से मांग की थी कि संघर्ष वाले क्षेत्र में संघर्ष में कमी लाने के लिए ज़रूरी कदम उठाए।

इन संस्थानों की रिपोर्ट के अनुसार म्यांमार चीन की क्षेत्रीय राजनीतिक (वन बेल्ट वन रोड) के लिए महत्वपूर्ण हैसियत रखता है और 2017 में चीन ने 18.53 अरब डालर से अधिक का म्यांमार में निवेश किया है। इसी के साथ राखीन संकट पर चीन रुख यह रहा है कि उसने राखीन संकट को म्यांमार का आंतरिक मामला बताया है उसमे किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से इनकार किया है।

चीन के अतिरिक्त म्यांमार का भारत के लिए भी बहुत महत्व है, भारतीय म्यांमार को दिल्ली के लिए दक्षिण पूर्व एशिया का द्वार मानते हैं और इस देश में कई आर्थिक परियोजनाए चला रखी हैं।

Total Share

SHARE